मोहर्रम के रोजे रखने की फजीलत क्या है? पूरी जानकारी (2022)

मोहर्रम के दो रोजे रखने की फजीलत क्या है? 

मोहर्रम के कितने रोजे रखे जाते हैं?

मोहर्रम के रोजे रखने की फजीलत क्या है?

अस-सलामु अलयकुम व रहमतुल्लाही व बराकात हो। दोस्तों स्वागत है आपका हमारे इस न्यू पोस्ट में आज हम आपको मोहर्रम के बारे में जानकारी देने वाले हैं। मोहर्रम का महीना बहुत ही पाक और इस महीने की बहुत ही ज्यादा फजीलत मानी जाती है।

क्योंकि यह महीना इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक सबसे पहला महीना होता है। इसीलिए इस महीने को काफी पवित्र महीना माना जाता है। दोस्तों इस महीने में 10 तारीख को मोहर्रम भी मनाए जाते हैं। और मुहर्रम मनाने से पहले 2 दिन के रोजे भी रखे जाते हैं तो रोजे रखने की फजीलत क्या है? और यह रोजे क्यों रखे जाते हैं?

मोहर्रम के रोजे रखने की फजीलत क्या है? (muharram ke roze ki fazilat)

मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया? जिसने मोहर्रम के महीने में 9 तारीख का एक रोजा रखा उसके 2 साल के गुनाह को माफ कर दिया जाता है। और जिसने 2 रोजों को रखा तो उसको 1 महीने के रोजे का सवाब मिलता है।

इसलिए इस महीने में रोजे रखने की बहुत ही बड़ी फजीलत है। और बहुत ही बड़ा सवाब है। मोहर्रम के महीने में बहुत से लोग कहते हैं कि 10 रोजे रखने चाहिए लेकिन यह यह जरूरी नहीं है कि आप को 10 रोजे ही रखने हैं आप सिर्फ दो रोज भी रख सकते हो।

लेकिन मोहर्रम के महीने में रोजे रखने का बहुत ही बड़ा सवाब है, इसलिए सभी मुहर्रम के महीने में ज्यादा से ज्यादा रोजे रखें।

मोहर्रम के कितने रोजे रखे जाते हैं?

मोहर्रम के महीने में दो रोज बहुत ज्यादा जरूरी होते हैं। यह दो रोजे आपको 9 और 10 तारीख का रोजा रखना होता है। हमारे नबी मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया? जो व्यक्ति दो रोजे रख लेता है उसके 2 साल के गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। और उसको एक रोजे के बदले में 1 महीने के रोजे के बराबर सवाब मिलता है।

इसलिए मुहर्रम के महीने में कम से कम 2 रोजे जरूर रखें। बहुत से लोग कहते हैं कि मोहर्रम के महीने में 10 तारीख तक रोजे रखना चाहिए यानी के 10 रोजा रखना चाहिए। लेकिन यह जरूरी नहीं है और हमारे नबी ने कभी भी रमजान के महीने के अलावा किसी भी महीने के पूरे रोजे नहीं रखे हैं। अगर आपको अपने नबी की सुन्नत को अदा करना है तो आप 10 और 9 तारीख का रोजा जरूर रखें।

तो दोस्तों अगर आप रोजे को रखना चाहते हो तो आपको रोजा रखने का तरीका भी मालूम होना चाहिए।

रोजा रखने का तरीका क्या है?

रोजा आप चाहे मोहर्रम का रखो या फिर रमजान के महीने का रोजा रखने का तरीका एक ही होता है तो मुहर्रम का रोजा रखने का तरीका क्या है? चलिए आपको बताते हैं सबसे पहले शहरी करना होता है तो आपको सहरी के टाइम उठना है और आपको शहरी करना है शहरी करने के बाद आपको रोजे की नियत करना है।

रोजा रखने की नियत कैसे बनती है?

रोजा रखने के लिए सबसे पहले आपको मन में यह ख्याल रखना है कि मुझे आज पूरे दिन खुदा की इबादत में रहना है और मुझे मोहर्रम के लिए या रमजान के लिए रोजा रखना है। उसके बाद आपको फजर की नमाज को अदा करना है

फजर की नमाज के बाद आपको पांचो टाइम की नमाज तो हमेशा पढ़नी ही चाहिए लेकिन रोजे की हालत में आपको किस भी हाल में नमाज नहीं छोड़नी है। उसके बाद आपको मगरिब की अजान होने पर रोजा खोलना है। रोजा खोलने के बाद आपका रोजा मुकम्मल हो जाएगा।

लेकिन दोस्तों रोजा सिर्फ भूखा रहने का नहीं होता है, रोजा आपका आपके शरीर के सभी अंग का होता है। जैसे कि नाक, कान, जुबान, सभी का रोजा होता है।

आंख नाक जुबान का रोजा मतलब क्या होता है?

इसका मतलब होता है कि अगर आप रोजे को रखते हो तो आपको आंख का भी रोजा रखना होता है। नाक का भी रोजा रखना होता है। मुंह का भी रोजा रखना होता है। जुबान का भी रोजा रखना होता है।

आंख नाक जुबान का रोजा का रोजा कैसे रखे?

आंख, नाक, जुबान, का रोजा रखना बहुत ही आसान है इसमें आपको यह ध्यान रखना है जब आप रोजा रखते हो तो आपको आंख का रोजा भी रखना होता है।

जुबान का भी रोजा रखना होता है। और नाक का भी रोजा रखना होता है। इसको और आसान बनाते हैं। 

नाक का रोजा क्या है?

नाक के रोजे का मतलब यह होता है कि आपको रोजे की हालत में ज्यादा इस्माइल वाली खुशबू वाली या गंदगी वाली चीज को नहीं सुंगना है।

आंख का रोजा क्या है?

आंख के रोजे का मतलब होता है कि आपको किसी भी चीज पर गंदी नजर नहीं डालनी है। औरतों के ऊपर खास करके आपको बिल्कुल भी गंदी नजर नहीं डालनी है। आपको गंदी चीज नहीं देखनी है। आपको फिल्म नहीं देखनी है। या डांस पार्टी नहीं देखनी है। आपको अपने मोबाइल में फिल्में नहीं देखनी है।

जुबान का रोजा क्या है?

रोजे की हालत में आपको गाली नहीं बोलनी है किसी को भी भला बुरा नहीं बोलना है। इसी को जबान का रोजा कहते है रोजे की हालत में आपको गाना नहीं गाना है। 

ऐसा करने पर आपको रोजा पूरी तरह से मुकम्मल हो जाएगा लेकिन रोजा रखने से पहले और रोजा रखने के बाद खोलने की दुआ क्या होती है चलिए यह भी हम आपको बता देते हैं

रोजा रखने की दुआ

रोजा रखने की दुआ बहुत ही छोटी सी होती है आपको इसको याद जरूर करना है और जब रोजा रखने के लिए सहरी कर लो उसके बाद यह दुआ आपको पढ़नी है।

(व बि सोमि गदिन नवई तु मिन शहरि रमजान) 

(وَبِصَوْمِ غَدٍ نَّوَيْتُ مِنْ شَهْرِ رَمَضَانَ)

मोहर्रम के रोजे रखने की फजीलत क्या है?

रोजा खोलने की दुआ

इस दुआ को आपको रोजा खोलने से पहले पढ़नी है!

अल्लाहुम्मा इन्नी लका सुमतु, व-बिका आमन्तु, व-अलयका तवक्कालतू, व- अला रिज़क़िका अफतरतू।\

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